शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकाक्षेप

सियारामदास नैयायिक द्वारा लगाये गए निम्नांकित द्वेषपूर्ण आक्षेपों के लिए महर्षि दयानंद सरस्वती स्मृति भवन न्यास, जोधपुर द्वारा शास्त्रार्थ की चुनौती दी जा चुकी है

कायर सियारामदास शास्त्रार्थ की चुनौती का न्यास को जवाब देने की भी हिम्मत नहीं कर पा रहा है. 

नैयायिक आर्य विद्वान् से डरता है तो न्यास ने आर्य विदुषी से शास्त्रार्थ का आमंत्रण दिया है. 

इस वैशाखनंदन ने अपनी चारागाह (फेसबुक पेजों पर) जवाब देने वाले आर्यों को ब्लाक कर रखा है.

सच है, कुत्ते हाथी से दूर रहकर ही भौंकते हैं. 

दयानन्दीयभ्रान्तिगिरिभङ्ग--पृष्ठ-१,   

वेदों के भाग मन्त्र और ब्राह्मण, 

वैदिक सनातन धर्म में मन्त्र और ब्राह्मण इन दोनों को “ वेद ”-नाम से कहा गया है—“ मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ”—कात्यायन+आपस्तम्ब |ब्राह्मण शब्द की व्युत्पत्ति है— 
“ ब्रह्मणो—मन्त्रात्मकस्य वेदस्य इदम्—यज्ञक्रियादितद्बोधकमन्त्र व्याख्यानस्वरूपप्रतिपादकं प्रवचनं ब्राह्मणम् “ | 
ब्रह्म अर्थात मन्त्रामक जो संहिता भाग है उससे सम्बद्ध अर्थात् यज्ञादि कर्मों एवं उनके बोधक मन्त्रों के व्याख्यानात्मक स्वरूप का प्रतिपादक प्रवचन ब्राह्मण कहा जाता है | 
ब्रह्म का अर्थ “ मन्त्र ” वेद से ही ज्ञात होता है—  वै मन्त्रः—शतपथ ब्राह्मण-७/१/१/५, 
भट्टभास्कर जैसे भाष्यकार कहते हैं कि जिस ग्रन्थ में यज्ञादि कर्म और उनसे सम्बद्ध मन्त्रों का व्याख्यान हो उसे ब्राह्मण कहते हैं—  “ ब्राह्मणं नाम कर्मणस्तन्मन्त्राणांच व्याख्यानग्रन्थः “—तै०सं०—१/५/१, 

अब प्रकृत में आयें | स्वामी दयानंद ब्राह्मण भाग के वेदत्व का खंडन करने के लिए लिखते हैं “लौकिकास्तावद् गौरश्वः पुरुषो हस्ती शकुनिर्मृगो ब्राह्मण इति |वैदिकाः खल्वपि “ शन्नो देवीरभीष्टये , इषे त्वोर्जे वा ,अग्निमीले पुरोहितम्,अग्न आयाहि वीतये इति | यदि ब्राह्मणभागस्यापि वेदासंज्ञाsभीष्टाभूत्तर्हि तेषामप्युदाहणणमदाद् महाभाष्यकारः |--  
“ किन्तु यानि गौरश्व इत्यादीनि लौकिकोदाहरणानि दत्तानि तानि ब्राह्मणादिग्रन्थेष्वेव घटन्ते, कुतः? तेष्वीदृशशब्दव्यवहारदर्शनात् “|   --------------ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका—वेदसंज्ञाविचारप्रकरण, 

स्वामी जी यहाँ कह रहे हैं कि महाभाष्यकार पतंजलि ब्राह्मण भाग को वेद नही मानते ,क्योंकि उन्होंने लिखा है कि लौकिक लोग गौः, अश्वः, पुरुषः, हस्ती, शकुनिः,मृगः,ब्राह्मणः—ऐसा प्रयोग करते हैं और वैदिक लोग – “शन्नो देवी---वीतये “ ऐसा प्रयोग | यदि महाभाष्यकार को ब्राह्मणभाग की वेदसंज्ञा अभीष्ट होती तो उसका भी उदाहरण ऋग्वेद आदि के मन्त्रों की तरह देते, किन्तु दिए नही, अतः महाभाष्यकार को मन्त्रभाग की ही वेदसंज्ञा अभिमत है,इसीलिये उन्होंने मन्त्रभाग के ही प्रथम मंत्र के प्रतीक को लेकर उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया |

आचार्य सियारामदास नैयायिक—वाह स्वामी जी ! आपकी तर्कोपस्थापनकला अद्भुत है और महाभाष्य का अध्ययन भी गजब | क्योंकि “ महाभाष्य के पस्पशाह्निक में ही महाभाष्यकार ब्राह्मणभाग के उन वाक्यों को प्रस्तुत करते हैं जिन पर आप जैसे महामनीषी की दृष्टि ही नही गयी—

“ वेदे खल्वपि –‘ पयोव्रतो ब्राह्मणः-यवागूव्रतो राजन्यः-आमिक्षाव्रतो वैश्यः ‘ इत्युच्यते |---बैल्वः खादिरो वा यूपः स्यात् |--अग्नौ कपालान्यधिश्रित्याभिमन्त्रयते “|
--यहाँ भगवान भाष्यकार ने “ वेदे “ इस शब्द से वेद का नाम लेकर “ पयोव्रतो ब्राह्मणः—इत्यादि से जिन वाक्यों को प्रस्तुत किया है वे ब्राह्मणभाग के ही तो हैं | मन्त्रभाग में तो उनका दर्शन ही दुर्लभ है |

और स्वामी जी ! आपकी पुस्तक “ संस्कार विधि “ के पृष्ठ ७९ के अनुसार “ पयोव्रतः “ शतपथ ब्राह्मण का वचन है | “ बैल्वाः खादिरो वा “—ऐतरेय ब्राह्मण की द्वितीय पंचिका के आरम्भ में है | 
यदि ब्राह्मणभाग महाभाष्यकार को वेद मान्य नही होता, तो वे वेद का नाम लेकर ब्राह्मणभाग के वाक्यों को क्यों उद्धृत करते ? ऐसे ही अनेक स्थलों में महाभाष्यकार ने ब्राह्मणभाग के वाक्यों को उद्धृत किया है, हम “स्थालीपुलाक ” न्याय से एक स्थल को दिखाकर आगे बढ़ेंगे-–   

आचारे नियमः—आचारे पुनर्ऋषिर्नियमं वेदयते –“ तेsसुरा हेलयो हेलय इति कुर्वन्तः पराबभूवुः “ इति |--पस्पशाह्निक,   
यहाँ ऋषिः का अर्थ महावैयाकरण कैयट वेद लिखते हैं –ऋषिः –वेदः—प्रदीप | और यह वाक्य आप कहीं भी मन्त्रभाग में नहीं दिखा सकते | ऐसे बहुत से ब्राह्मणभाग के वाक्य महाभाष्यकार द्वारा वेदत्वेन उल्लिखित हैं | अतः महाभाष्यकार भी ब्राह्मणभाग को वेद मानते हैं |
स्वामी दयानन्द पर आपत्ति—आपने ब्राह्मणभाग के वेदत्व का खण्डन करते हुए जो यह लिखा—“ किन्तु यानि गौरश्व इत्यादीनि लौकिकोदाहरणानि दत्तानि तानि ब्राह्मणादिग्रन्थेष्वेव घटन्ते, कुतः? तेष्वीदृशशब्दव्यवहारदर्शनात् “ |-- जो गौः अश्वः इत्यादि लौकिक उदाहरण दिए गए हैं वे ब्राह्मण आदि ग्रन्थों में ही घटते हैं, क्योंकि उन्ही में ऐसे शब्दप्रयोग देखे जाते हैं | 
यहाँ “ तानि ब्राह्मणादिग्रन्थेष्वेव घटन्ते “—वाक्य में एवकार का प्रयोग आपके मानसिक इलाज की और संकेत कर रहा है , क्योंकि महाभाष्यकार ने जिन ७ गौः आदि प्रयोगों का नाम लिया है क्या उतने ही लोक में प्रयुक्त होते हैं? या उससे अधिक ? 
प्रथम कल्प अंगीकार्य नही हो सकता ,क्योंकि उनसे भिन्न घटः, पटः,राजा,रक्षान्सि,पिशाचाः,इन्द्रः,हव्यवाहम्, आदि बहुत से प्रयोग हैं जो लोक में प्रयुक्त होते हैं |
यदि द्वितीय पक्ष स्वीकार करें,तो उनका प्रयोग मन्त्रभाग में भी प्रचुर मात्रा में मिलने से “ तानि ब्राह्मणादिग्रन्थेष्वेव घटन्ते, कुतः? तेष्वीदृशशब्दव्यवहारदर्शनात् “ कथन की धज्जी उड़ जायेगी | 
देखें उनकी कुछ झलक-- “ रक्षान्सि,पिशाचाः—अथर्ववेद—१/६/३४/२, इन्द्रः-ऋग्वेद—५/७/९/१, हव्यवाहम्—ऋग्वेद-८/१/१२,  हिरण्यम्, दुहिता—शुक्ल यजुर्वेद-१९/४, आदि --ये प्रयोग मन्त्रभाग में भी मिलते हैं | इतना ही नही महाभाष्यकार द्वारा प्रदर्शित सभी लौकिक प्रयोग मन्त्रभाग में मिलते हैं | देखें—गौः+अश्वः –ये दोनो शब्द यजुर्वेद में आये है | पुरुषः+ब्राह्मण—शब्द यजुर्वेद, हस्ती शब्द –अथर्ववेद-३/४/२२/३,, शकुनि+मृग--शब्द–ऋग्वेद, 
अतः केवल अहंकार से आक्रान्त आपके अनुसार अब तो मन्त्रभाग भी वेद नही कहा जा सकता क्योंकि वे प्रयोग यहाँ भी मिल रहे हैं | चले थे ब्राह्मणभाग के वेदत्व का खंडन करने, उलटे संहिताभाग के वेदत्व से ही हाथ धो बैठे—  “ चौबे गए छब्बे बनने दुबे बनकर लौटे “ कहावत चरितार्थ हो गयी | 
>>>>> जयतु भारतम्,जयतु वैदिकी संस्कृतिः, जय श्रीराम<<<<<    --ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का क्रमशः खण्डन--   आचार्य सियारामदास नैयायिक — with आचार्य सियारामदास नैयायिक and 47 others


दयानन्दीयभ्रान्तिगिरि-भंग—पृष्ठ २,
वेद के भाग मन्त्र और ब्राह्मण 
मन्त्र और ब्राह्मणभाग ये दोनों वेद कहे जाते है—इसका खण्डन स्वामी दयानन्द जी ने महाभाष्य के बल पर करना चाहा जिसकी धज्जी धज्जी उड़ा दी गयी | अब वे महाभाष्यकार से पूर्ववर्ती महर्षि पाणिनि के सूत्रों के आधार पर ब्राह्मणभाग वेद नही है—ऐसा कह रहे हैं—
“ द्वितीया ब्राह्मणे—२/३/६०, चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि “—२/३/६२, इत्यष्टाध्याय्यां सूत्राणि | अत्रापि पाणिन्याचार्यैः वेदब्राह्मणयोर्भेदेनैव प्रतिपादनं कृतमस्ति |यद्यत्र छन्दोब्राह्मनयोर्वेदसंज्ञाsभीष्टा भवेत्तर्हि “ चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि “इत्यत्र छन्दोग्रहणं व्यर्थं स्यात्, कुतः ? द्वितीया ब्राह्मणेति (१)ब्राह्मणशब्दस्य प्रकृतत्वात् | अतो विज्ञायते न ब्राह्मणग्रन्थानां वेदसंज्ञाsस्तीति “---ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका—पृष्ठ-८६,८७,

स्वामी जी कह रहे हैं कि “ द्वितीया ब्राह्मणे और चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि “ इस प्रकार के अष्टाध्यायी में २ सूत्र हैं | यहाँ पाणिनि आचार्य ने वेद और ब्राह्मण इन दोनों का भेदेन—भेदतया ही प्रतिपादन किया है | यदि उन्हें वेद और ब्राह्मण इन दोनों की वेद संज्ञा अभीष्ट होती तो “ चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि “ इस सूत्र में छन्दो का ग्रहण व्यर्थ हो जाएगा क्योंकि द्वितीया ब्राह्मणे इस पहले वाले सूत्र में ब्राह्मण शब्द आया है, वही “ चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि “ में भी आ जाएगा | अब छन्दसि ग्रहण करने की क्या आवश्याकता है ? फिर भी आचार्य पाणिनि ने छन्दसि का ग्रहण किया, इससे ज्ञात होता है कि ब्राह्मण ग्रंथों की वेद संज्ञा नहीं है | 

आचार्य सियारामदास नैयायिक ---धन्यवाद स्वामी जी ! पहले  तो यह समझ लीजिये कि आपका संस्कृत वाक्य ही अशुद्ध है, क्योंकि आपने “ द्वितीया ब्राह्मणे और चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि " मात्र इन दो सूत्रों का उल्लेख करके लिखा है— “ इत्यष्टाध्याय्यां सूत्राणि “ | 
बहुत्व की विवक्षा में “ बहुषु बहुवचनम् “—१/४/२१,--सूत्र से बहुवचन करने का निर्देश आचार्य पाणिनि कर रहे हैं, और आप उन्हीं के सूत्र का उल्लंघन करके दो सूत्रों के लिए ही बहुवचन का प्रयोग कर बैठे ? दो सूत्र जब आपके द्वारा प्रस्तुत किये गए तो उनके लिए द्वित्व की विवक्षा होने से “ द्वेकयोर्द्विवचनैकवचने “—१/४/२२,

पाणिनिसूत्र से द्विवचनान्त “ इत्यष्टाध्याय्यां सूत्रे “—ऐसा शुद्ध वाक्य आपको लिखना चाहिए था, न कि  “इत्यष्टाध्याय्यां सूत्राणि “—ऐसा अशुद्ध वाक्य |
जब आप पाणिनि महर्षि से स्थापित मर्यादा को तोड़कर अशुद्धि को गले लगा लिए तो उनके सूत्रों का अर्थ शुद्धलिखेंगे—ऐसी आशा आप से विद्वत्--समाज तो कम से कम नही ही कर सकता | और यह अभी विचारवेला में सुस्पष्ट भी हो जायेगा | 

“ द्वितीया ब्राह्मणे—२/३/६०, चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि “—२/३/६२, इत्यष्टाध्याय्यां सूत्राणि | अत्रापि पाणिन्याचार्यैः वेदब्राह्मणयोर्भेदेनैव प्रतिपादनंकृतमस्ति |यद्यत्र छन्दोब्राह्मणयोर्वेदसंज्ञाsभीष्टा भवेत्तर्हि “ चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि “इत्यत्र छन्दोग्रहणं व्यर्थं स्यात्, कुतः ?  द्वितीया ब्राह्मणेति (१)ब्राह्मणशब्दस्य प्रकृतत्वात् | अतो विज्ञायते न ब्राह्मणग्रन्थानां वेदसंज्ञाsस्तीति “--ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका—पृष्ठ-८६,८७,--
यहाँ आपने छन्दोग्रहण के वैयर्थ्य की आपत्ति दी है | इस पर मैं आपसे पूछना चाहूंगा कि द्वितीय सूत्र में प्रविष्ट छन्दसि इस सप्तम्यंत पद की प्रकृति छन्दस् से आप क्या अर्थ ले रहे हैं ? केवल स्वाभिमत मन्त्रभाग रूप वेद ?
अथवा आपस्तम्ब और कात्यायन से अभिमत मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग--एतदुभयरूप वेद ? 
यदि स्वाभिमत मन्त्र भागात्मक वेद ले रहे हैं, तब छन्दोग्रहण के वैयर्थ्य की आपत्ति नही दे सकते, क्योंकि तब छन्दसि का अर्थ हो जाएगा “ मन्त्रे ” |
अब उस सूत्र में जब छन्दसि “मन्त्रे” अर्थ का बोधक होगा , तब छन्दसि रहने पर उसके वैयर्थ्य की आपत्ति नही दी जा सकती , क्योंकि मन्त्रात्मक वेद ब्राह्मण भाग से भिन्न होने के कारणमन्त्र भाग में होने वाला कार्य सूत्र में “छन्दसि” रखने पर ही होगा, अन्यथा नही ,ब्राह्मणे के आने पर वह कार्य मन्त्र भाग में न होने से — प्रयोगासिद्धिरूप अनिष्ट की आपत्ति होगी और साथ ही ब्राह्मण भाग में षष्ठी विभाक्ति रूप कार्य प्राप्त होने से अनभिमत शब्दप्रयोग की आपत्ति भी | अतः छान्दोग्रहण के वैयर्थ्य की आपत्ति इस पक्ष में नही दे सकते |

यदि आप दूसरा पक्ष स्वीकार करें कि “ मैं आपस्तम्ब और कात्यायन के अनुसार मन्त्र और ब्राह्मणभागदोनों को वेद मानकर छान्दोग्रहण के वैयर्थ्य की आपत्ति दे रहा हूँ ”,तो यह आपके लिए और अधिक घातक सिद्ध होगा |
प्रथम तो यह कि आप ब्राह्मणभाग के वेदत्व का निराकरण करने के लिए कटिबद्ध हैं और अब हम वैदिक सनातनधर्मियों के सिद्धान्त को स्वीकार कर लिए | और स्वपक्ष का परित्याग कर रहे हैं | जो पराजय का कारण " प्रतिज्ञासन्न्यास " नामक एक निग्रह स्थानमाना जाता है---
"पक्षप्रतिषेधे प्रतिज्ञातार्थापनयनं प्रतिज्ञासन्न्यासः " ---न्यायदर्शन--५/२/५,
और दूसरी बात यह कि इस पक्ष में भी छन्दोग्रहण के वैयर्थ्य की आपत्ति नही लग सकती,क्योंकि प्रथम सूत्र में ब्राह्मणे के रहने से वह सूत्र केवल ब्राह्मणभाग में षष्ठी की अपवाद द्वितीया का विधायक होगा और द्वितीय सूत्र में छन्दसि के रहने से वह मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग इन दोनों में षष्ठी का विधायक होगा |
यदि द्वितीय सूत्र में “छन्दसि” नही रखें प्रथम सूत्र से अनुवृत्तिद्वारा ब्राह्मणे को लायें, तो उससे केवल ब्राह्मणभाग में षष्ठीका विधान हो सकेगा मन्त्रभाग में नही | अतः हर हालत में “ छन्दसि” रखना पड़ेगा | अत एव छन्दोग्रहणके वैयर्थ्य की आपत्ति नही दी जा सकती |   >>जयतु भारतम्, जयतु वैदिकी संस्कृतिः, जय श्रीराम<<<
ऋग्वेदादि भाष्यभूमिका का खण्डन—आचार्य सियारामदास नैयायिक — with आचार्य सियारामदास नैयायिक and 46 others.

दयानन्दीयभ्रान्तिगिरि-भङ्ग ,, पृष्ठ ३ ,
वेद के भाग मन्त्र ओर ब्राह्मणग्रन्थ
मन्त्र और ब्राह्मणभाग ये दोनों वेद कहे जाते है—इसका खण्डन स्वामी दयानन्द जी ने महाभाष्य के बल पर करना चाहा जिसकी धज्जियां उड़ा दी गयी |इस तीसरे पृष्ठ के द्वारा उनके कथन में महाभाष्य से विरोध दिखलाकरमन्त्र और ब्राह्मण इन दोनों भागों का वेदत्व उन्ही के उद्धत सूत्रों के आधार पर सिद्ध करेंगे | साथ ही साथ व्याकरण के मुनित्रय की सम्मति भी सप्रमाण दिखलायेंगे | और इसी की पुष्टि में कुछ सूत्र का प्रस्तुतीकरण होगा जिससे भविष्य में कोई कुतर्की मिथ्या दुस्साहस न करे | आइये स्वामी जी की पूर्वोक्त पंक्तियाँ प्रस्तुत करके विचार करते हैं | 
“ द्वितीया ब्राह्मणे—२/३/६०, चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि “—२/३/६२, इत्यष्टाध्याय्यां सूत्राणि | अत्रापि पाणिन्याचार्यैः वेदब्राह्मणयोर्भेदेनैव प्रतिपादनंकृतमस्ति |यद्यत्र छन्दोब्राह्मणयोर्वेदसंज्ञाsभीष्टा भवेत्तर्हि “चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि “इत्यत्र छन्दोग्रहणं व्यर्थं स्यात्, कुतः ? 

द्वितीया ब्राह्मणेति (१)ब्राह्मणशब्दस्य प्रकृतत्वात् | अतो विज्ञायते न ब्राह्मणग्रन्थानां वेदसंज्ञाsस्तीति “
---ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका—पृष्ठ-८६,८७,--
स्वामी दयानन्द जी ! आपने कहा कि “ द्वितीया ब्राह्मणे और चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि “ इस प्रकार के अष्टाध्यायी में २ सूत्र हैं | यहाँ पाणिनि आचार्य ने वेद और ब्राह्मण इन दोनों का भेदेन—भेदतया ही प्रतिपादन किया है---
“ द्वितीया ब्राह्मणे—२/३/६०, चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि “—२/३/६२,  इत्यष्टाध्याय्यां सूत्राणि | अत्रापि पाणिन्याचार्यैः वेदब्राह्मणयोर्भेदेनैव प्रतिपादनं कृतमस्ति “ | 
यहाँ पर भी मैं आपसे पूछना चाहूंगा कि द्वितीय सूत्र में प्रविष्ट छन्दसि इस सप्तम्यंत पद की प्रकृति छन्दस् का अर्थ आप क्या ले रहे हैं ? केवल स्वाभिमत मन्त्रभाग रूप वेद ? अथवा आपस्तम्ब और कात्यायन से अभिमत मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग--एतदुभयरूप वेद ? 
यदि प्रथम पक्ष स्वीकार करें तो महाभाष्य से विरोध होगा क्योंकि उन्होंने “ चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि “ सूत्र के अंतर्गत वार्तिककर के वार्तिक की उपयोगिता दिखाते हुए “ तैत्तिरीय ब्राह्मण “ के वाक्य को उद्धृत किया है— या खर्वेण पिबति तस्यै खर्वो जायते—“ इत्यादि | 
विचार कीजिये कि जब षष्ठी विधायक सूत्र “ चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि “ में आप छन्दसि से केवल मन्त्र भाग रूप वेद लेंगे तब वह ब्राह्मणभाग में तो प्रवृत्त होगा नही , केवल मन्त्र भाग ही उसका विषय होगा | ऐसी स्थिति में सूत्रकार की कमी को दूर करने वाले वार्तिककार के वार्तिक का विषय भी मात्र मन्त्रभाग का ही प्रयोग होगा | फिर उस वार्तिक के उदाहरण के रूप में महाभाष्यकार भगवान् पतंजलि ने “ तैत्तिरीय ब्राह्मण “ के पूर्वोक्त वाक्य को क्यों रखा ? “ यथोत्तरं मुनीनां प्रामाण्यम् “ से तो स्वामी जी आप भी परिचित ही होंगे ? 
महाभाष्यकार ने सूत्र का योगविभाग करके “ तैत्तिरीय ब्राह्मण “ के प्रयोग की सिद्धि “ चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि “ सूत्र से ही कर दी | फलितार्थ यह निकला कि जिस छन्दसि शब्द को देखकर उसे वेद का वाचक मानकर आपने ब्राह्मणभाग के वेदत्व का खण्डन करना चाहा | उसी वेदार्थक सप्तम्यंत छन्दसि शब्द से भगवान् पाणिनि , कात्यायन और पतंजलि “ मन्त्र और ब्राह्मण “ भाग को वेद मान रहे हैं—यह बात प्रत्यक्ष सिद्ध हो रही है |
स्वामी जी ! देखिये- आपका प्रमाण स्वयं आपके विपरीत विषवमन कर रहा है | अतः इस विवेचन से आपके द्वारा प्रस्तुत “ चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि “-२/३/६२, सूत्र के विषय “ तैत्तिरीय ब्राह्मण “ के उदाहरण से यह सिद्ध हुआ कि यहाँ छन्दसि शब्द से ब्राह्मणभाग का ग्रहण ब्राह्मणभाग को वेद सिद्ध करता है | 

किन्तु यदि हम इस प्रमाण से छन्दसि से केवल ब्राह्मणभाग को ही यहाँ लेंगे तो “ छन्दसि “ के वैयर्थ्य की आपत्ति आ जायेगी क्योंकि इस सूत्र में ब्राह्मणभाग का कथन करने के लिए पूर्व सूत्र से ब्राह्मणे की अनुवृत्ति ही पर्याप्त है |अतः इस आपत्ति से बचने के लिए छन्दसि से ब्राह्मणभाग की भांति मन्त्र भाग का भी ग्रहण किया जायेगा | 
स्वामी जी आपको भ्रम न हो –इसलिए पाणिनि महर्षि के कुछ सूत्र आपके सम्मुख रखे जा रहे हैं—भगवान् पाणिनि जब कोई कार्य केवल मन्त्रभाग में करना चाहते हैं तब सूत्र में “ मन्त्रे “ बोल देते हैं |जब ब्राह्मणभाग मात्र में करना चाहते हैं तब “ ब्राह्मणे ” बोलते हैं |और जब वे मन्त्र और ब्राह्मण दोनों में विधान करना चाहते हैं तब सूत्र में “ छन्दसि “ बोल देते हैं | कहीं पर वे सूत्र में “ छन्दः “ पद से केवल मन्त्र भाग को कहते हैं | तो कहीं पर वे “ छन्दः “ पद से ब्राह्मणभाग को भी कहते हैं | जैसे “ द्वितीया ब्राह्मणे —२/३/ ६०, सूत्र से कर्म में प्राप्त द्वितीया का विधान केवल ब्राह्मण भाग में होता है ,मन्त्रभाग में नही | इसलिए यहाँ “ छन्दसि “ न कहकर “ ब्राह्मणे “ कहे | 
 इसीप्रकार केवल मन्त्रभाग में वे ण्विन् प्रत्यय कहना चाहते हैं तब मन्त्रे का उच्चारण करते हैं-“मन्त्रे श्वेतवहोक्थशस्पुरोडाशो”—३/२/७१, |
जब् महर्षि मन्त्र और ब्राह्मण इन दोनों में कार्य का विधान करते हैं तब मन्त्रे या ब्राह्मणे न कहकर छन्दसि कहते हैं | जैसे---“ चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि ” ,इसका उदहारण ” तैत्तिरीय ब्राह्मण “ का वाक्य महाभाष्यकार द्वारा उद्धृत दिखाया जा चुका है- “ या खर्वेण पिबति तस्यै खर्वो जायते—“ इत्यादि - | कहीं तो आचार्य पाणिनि मन्त्रभाग को छन्दः शब्द से कहते हैं—“ छन्दो ब्राह्मणानि च तद्विषयाणि “—४/२/६, तो कहीं केवल ब्राह्मणभाग को ही छन्दः शब्द से कहते हैं---“ जुष्टार्पिते च च्छन्दसि “---६/१/२०९, इन प्रमाणों से यह सिद्ध हुआ कि वेदवाचकतया प्रसिद्ध छन्दः शब्द का मन्त्रभाग की भांति ब्राह्मणभाग में प्रयोग तथा “ चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि “— २/३/६२, सूत्र में वेद के उदहारण रूप में तैत्तिरीय ब्राह्मण का महाभाष्यकार द्वारा प्रस्तुत किया जाना ब्राह्मण भाग के वेद होने में सबसे बड़ा प्रमाण है | और इसी की पुष्टि आपस्तम्ब तथा कात्यायन भी कण्ठतः कर रहे हैं | स्वामी जी ! आप पाणिनि सूत्र से ब्राह्मणभाग का अवैदिकत्व सिद्ध न कर  सके ,उलटे वे वेद सिद्ध कर दिए गए | अतः आर्य समाजियों का मूल ही  ध्वस्त हो गया उस पर आधारित पूरा का पूरा समाज भ्रान्तिभंवर में चक्कर  काट रहा है | इन्हें पुनः वैदिक सनातन धारा से जुड़ना होगा | >>>जय श्रीराम<<<----जयतु भारतम्, जयतु वैदिकी संस्कृतिः----- ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का खण्डन —आचार्य सियारामदास नैयायिक — with आचार्य सियारामदास नैयायिक and 34 others.

दयानन्दीयभ्रान्तिगिरि –भङ्ग,पृष्ठ ४, 

वेद के भाग मन्त्र और ब्राह्मण ,

महर्षि आपस्तम्ब और कात्यायन से समर्थित ब्राह्मण भाग हमारे वैदिक धर्म में सदा संहिता के सामान ही वेदरूप में मान्य रहा है | इस पर स्वामी दयानन्द जी इस प्रकार आक्षेप किये हैं— 
“भाष्यकारेण छन्दोवन्मत्वा ब्राह्मणानामुदाहरणानि प्रयुक्तानि|अन्यथा ब्राह्मणग्रन्थस्य प्रकृतत्वाच्छन्दोग्रहणमनर्थकं स्यादिति |  --ऋग्वेदादि भाष्यभूमिका-पृष्ठ—३७७, 
अर्थ—भाष्यकार ने ब्राह्मण ग्रंथों को वेद के समान मानकर उनको उदाहरण रूप में प्रस्तुत किया है |अन्यथा—यदि ऐसा न मानें तो “ द्वितीया ब्राह्मणे ” सूत्र से अनुवृत्ति द्वारा ब्राह्मण ग्रन्थ प्राप्त हो जाने से “ चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि “ सूत्र में छन्दोग्रहण अनर्थक  हो जायेगा |अतः वेद से ब्राह्मण भाग भिन्न है | 
समाधान----  आचार्य सियारामदास नैयायिक---
नहीं स्वामी जी ! ऐसा कथमपि नही, मैंने आपसे प्रमाणतया प्रस्तुत “ चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि “ में प्रश्न करके सिद्ध कर दिया है कि छन्दसि का अर्थ मन्त्र और ब्राह्मणभाग—एतदुभय रूप ही विवक्षित है | वैसे जो आप यह मानसिकता बनाकर विचार करने चले हैं कि “ छन्दस् का अर्थ मन्त्रभाग रूप वेद होता है ”— बस यही आपके भ्रम का कारण है | दूसरी बात यह कि आप पहले तो महाभाष्यकार पतंजलि जी को “ महाभाष्यकृत् “-पृष्ठ ८६ में लिखे हैं  और अब उनके महत्त्व को कम क्यों कर दिए “ महा “ शब्द हटाकर ? आप अपने पक्ष से उन्हें हटता हुआ देखकर तो ऐसा नही किये ? श्रीमान् जी ! ध्यान दें --वैदिक प्रक्रिया में इसी सूत्र की तरह अनेक सूत्रों में छन्दसि शब्द आया है | छन्दसि शब्द युक्त सूत्र से जो भी कार्य वेद में किये जाते है वे सभी मन्त्र और ब्राह्मण इन दोनों भागों में होते हैं, केवल मन्त्र भाग में ही नही , जैसे “” क्त्वाsपि छन्दसि “—७/१/३८, से छन्दसि उसके बाद वाले सूत्र “ सुपां सुलुक्पूर्वसवर्णाच्छेयाडाड्यायाजालः—७/१/२९, में आता है |
और फिर यह सूत्र मन्त्र और ब्राह्मण इन दोनों भागों में प्रवृत्त होता है |देखें प्रयोग –
“ सविता प्रथमेsहन् “-यजुर्वेद-३९/६, मन्त्र के अहन् चतुर्थी विभक्ति का लुक् हुआ है |ठीक इसी प्रकार यह सूत्र शतपथ ब्राह्मण के—  “ यश्चाsयं दक्षिणेsक्षन् पुरुषः-१४/६/८/३, 
इस अन्श के अक्षन् के चतुर्थी डे. विभक्ति का भी लुक् करता है | स्वामी जी ! आपके अनुसार यदि छन्दसि का अर्थ केवल मन्त्र भागात्मक वेद लें तो कहीं भी ब्राह्मण भाग में सूत्र की प्रवृत्ति न होने से इन इन प्रयोगों की सिद्धि कथमपि नही हो सकती | 
अतः छन्दसि का अर्थ मन्त्र और ब्राह्मण भाग दोनों ही हैं , जैसा कि आपस्तम्ब और महर्षि कात्यायन ने पहले ही कह दिया है | उस समय न आप अवतरित हुए थे न ही मैं |
अतः छन्दसि का अर्थ इन प्रयोगों को देखते हुए मन्त्र और ब्राह्मण भाग -- दोनों मानना पड़ेगा | इसी से सकल प्रयोगों की सिद्धि और सभी ऋषियों के वाक्यों की पुष्टि भी होगी | 
और ऋषियों का विरोध अपने को एक ऋषि रूप में स्वीकार करने वाला भला कैसे कर सकता है |
लोक और वेद ये दो पक्ष प्रयोगसाधुत्व की दृष्टि से वैयाकरणों में विशेष समादृत हैं | 
” प्रथामायाश्च द्विवचने भाषायाम् “-७/२/८८, सूत्र से भाषा अर्थात् लोक में युष्मद् और अस्मदद् शब्द को आकार अन्तादेश होता है ,वेद में नहीं |और इसका प्रत्युदाहरण जैसे मन्त्र भाग है वैसे ही ब्राह्मण भाग भी |-
“ युवं सुराममश्विना “—यजुर्वेद २०/७६, मन्त्रघटक युवं मे जैसे आकार अन्तादेश नही हुआ | वैसे ही
“ युवं वै ब्रह्माणौ भिषजौ “-शतपथ-८/२/१/३, ५/५/४/२५,

“ युवमिदं निष्कुरुतम् “-ऐतरेय ब्राह्मण-२/२८, में भी आकार अन्तादेश “युवां “-ऐसा नही हुआ | 
अतः मन्त्र और ब्राह्मण दोनों ही भाग वेद सिद्ध होते हैं | अर्थात् ब्राह्मणभाग में आतिदेशिक वेदत्व नही अपितु साक्षात् वेदत्व है | इन प्रमाणों और युक्तियों की अवहेलना पुच्छविषाणहीन पशु के अतिरिक्त और कोई भी नही कर सकता |---जय श्रीराम---जययु भारतम्, जयतु वैदिकी संस्कृतिः-------ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का खण्डन—आचार्य सियारामदास नैयायिक — with आचार्य सियारामदास नैयायिक and 45 others.

दयानन्दीयभ्रान्तिगिरि-भङ्ग,पृष्ठ-५
,स्वामी दयानन्द जी का तर्क है कि “ द्वितीया ब्राह्मणे ”-२/३/६०, और “ चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि ”-२/३/६२, इन सूत्रों में वेद तथा  ब्राह्मण ग्रन्थ का भेदतया प्रतिपादन होने से वेद और ब्राह्मण भिन्न हैं |--ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका-पृष्ठ- ८६-८७, 
समाधान—आचार्य सियारामदास नैयायिक—स्वामिप्रवर ! तब तो आपको अपने इसी तर्क के अनुसार “ मन्त्रे श्वेतवहोक्थशस्पुरोडाशो ण्विन् ”-३/२/७१, “ विजुपेच्छन्दसि ”-३/२/७३, इन सूत्रों में भी मन्त्र और वेद का भेदेन प्रतिपादन होने से वेद और मन्त्र भिन्न हैं—ऐसा भी मानना पड़ेगा |
इसे स्वीकार कर नही सकते क्योंकि आपने मन्त्रभाग को वेद मानकर व्याख्या लिखी है | 

दयानन्देन यस्तर्कः दत्तो वेदत्वखण्डने |
 तेनैव तर्कघातेन दयानन्दो दिवङ्गतः || 
-----जय श्रीराम----- -------जयतु भारतम्, जयतु वैदिकी संस्कृतिः----- ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का खण्डन—आचार्य सियारामदास नैयायिक — with आचार्य सियारामदास नैयायिक and 48 others.


दयानन्दीयभ्रान्तिगिरि-भङ्ग,पृष्ठ-6, 

स्वामी दयानन्द स्वयं अपने ऊपर विश्वस्त नही , एक के बाद एक  तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं ब्राह्मणभाग के वेदत्व का खंडन करने के लिए | अब इनका नया दांव तथा उसका खंडन देखिये—

ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के पृष्ठ ८७ में आपने ब्राह्मणभाग के वेदत्व  का निराकरण करने में ऋषिप्रोक्तत्व हेतु दिया है— “ ऋषिभिरुक्तत्वाद् ”, अर्थात् ब्राह्मणभागो न वेदः कुतः ? ऋषिप्रोक्तत्वात्, रघुवन्शादिवत्— 
(ब्राह्मणभाग वेद नही हैं ऋषियों के द्वारा कथित होने से ) यह  अनुमान का स्वरूप निश्चित हुआ |

समाधान—    आचार्य सियारामदास नैयायिक—
वाह स्वामी जी ! आपके अनुसार ब्राह्मणभाग ऋषियों द्वारा कथित होने से वेद नही हैं और मन्त्रभाग चूंकि ऋषियों से कथित नही है इसलिए वेद हैं —कितना सुन्दर तर्क है ???
स्वामी जी ! अपने तर्क के आधार पर ही सुनें—जैसे मन्त्रभाग ऋषियों से कथित न होने से आपको वेद मान्य है, वैसे ही आज कल के लीचड़ सेक्सी उपन्यास आदि भी ऋषियों से कथित न होने से मन्त्रभाग की भांति क्या आपको वेद मान्य हैं ?

यदि आप कहें कि “ ऋषिप्रोक्तत्व हेतु अन्वयव्यतिरेक व्याप्ति वाला है, व्यतिरेक व्याप्ति में साध्याभाव का व्यापक हेत्वभाव होता है | वेदभिन्नत्वरूपसाध्य का अभाव जहाँ जहाँ होगा, वहां वहां ऋषिप्रोक्तत्वाभाव है, और यह साध्याभाव वेदत्व रूप मन्त्र भाग में निश्चित है और मन्त्र में ऋषिप्रोक्तत्व रूप हेतु का आभाव भी है | अतः कोई दोष नही | 
तो इस पर मैं यही कहूँगा कि आपके सामान ही वेदत्व का निश्चय हम सनातनियों को आपस्तम्ब आदि ऋषियों के प्रमाण से ब्राह्मणभाग में भी है | अतः वेदत्व रूप साध्याभाव का सुनिश्चय होने से उक्त अनुमान बाधदोष से ग्रस्त है, रही बात मन्त्रभाग में ऋषिप्रोक्तत्वाभाव की, वह भी बाधित है—इसे अभी दिखाते हैं |
स्वामी जी ! आपने ब्राह्मणभाग को पक्ष बनाकर ऋषिप्रोक्तत्व हेतु से उसमें वेदभिन्नत्व साधना चाहा है जो कथमपि सम्भव नही, क्योंकि मन्त्रभाग में ऋषिप्रोक्तत्व है—
“ ये एव मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टारः प्रवक्तारश्च,”-न्यायदर्शनभाष्य ४/१/६१,  मन्त्र और ब्राह्मण दोनों के द्रष्टा और प्रवक्ता ऋषि कहे गए हैं| अतः ऋषिप्रोक्तत्व दोनों में सामान है |
“ सूर्य ऋषिर्मन्त्रकृत् “ ऐतरेयब्राह्मण-६/१, “ ऋषे मन्त्रकृतां स्तोमैः “ — ऋग्वेद--९/११४/२,
यहाँ “ ऋषिः ” और “ मन्त्रकृतां ” का अर्थ जानने वाला “ मन्त्रभाग ” में “ ऋषिप्रोक्तत्व ” सहज ही समझ सकता है | अतः “ ऋषिप्रोक्तत्व हेतु मन्त्रभाग में भी होने से आपको ब्राह्मणभाग की भांति मन्त्रभाग भी वेद से भिन्न मानना पड़ेगा |
आप चले थे ब्राह्मणभाग को वेदभिन्न सिद्ध करने उलटे मन्त्रभाग के वेदत्व से ही हाथ धो बैठे |
“ चले थे नमाज छुड़ाने पर रोजे गले पड़ गए “ वाली कहावत चरितार्थ हो गयी |--
“ यश्चोपस्थापितस्तर्कः दयानन्देन खण्डने | तेनैव तर्कदण्डेन मन्त्रोsपि हस्ततो गतः " || 
----जय श्रीराम----  -------जयतु भारतम्,जयतु वैदिकी संस्कृतिः------ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का खण्डन—आचार्य सियारामदास नैयायिक — with आचार्य सियारामदास नैयायिक and 82 others.

दयानन्दीयभ्रान्तिगिरिभङ्ग,पृष्ठ-७,
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“ स्वामी दयानन्द जी का छल “
—स्वामी जी कहते हैं कि ब्राह्मणभाग ईश्वर से भिन्न लोगों के द्वारा कथित हैं अतः वेद नही—“ अनीश्वरोक्तत्वाद् “— ----ऋग्वेदभाष्यभूमिका, पृष्ठ-८०, 
ऐसी धूर्तता ? अत्याश्चर्य ?  दयानन्दियों ! अपने ऋषि को देखो यहाँ तो ब्राह्मणभाग में अनीश्वरोक्तत्व बतला रहे हैं और “ सत्यार्थ प्रकाश ” के सप्तसमुल्लास,पृष्ठ-१९२ में कह रहे हैं कि “धर्मात्मा योगी महर्षि जब जब जिस जिस के अर्थ को जानने की इच्छा करके ध्यानावस्थित हो परमेश्वर के स्वरूप में समाधिस्थ हुए तब तब परमात्मा ने अभीष्ट मन्त्रों के अर्थ बतलाये ” |
यहाँ महर्षि जी मन्त्रों के अर्थ ब्राह्मण को ईश्वर द्वारा ऋषियों को मिलना भी कह रहे हैं अर्थात ईश्वरोक्तत्व स्वीकार कर रहे हैं और भूमिका में “ अनीश्वरोक्तत्व " भी,  --इसे उन्मत्त प्रलाप के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है ? ऐसा कोई पागल ही कह सकता है | भूमिका में स्वामी जी ने अनीश्वरोक्तत्व की सिद्धि भी नही दिखलाई है |अतः परस्पर विरुद्ध कथन विचारानर्ह हैं |
दूसरी बात यह कि स्वामी जी आपने सप्तम समुल्लास के अंत में वेदों को परमेश्वरोक्त स्वीकार किया है |और ब्राह्मण भी परमेश्वरोक्त ही आपने माना है | अब यह बतलाएं कि ईश्वरोक्त मन्त्रभाग तो आप वेद माने किन्तु ईश्वरोक्त ही ब्राह्मणभाग को क्यों नही है ?यह केवल मनमानी या दुराग्रह के अतिरिक्त और क्या हो सकता है ?
भूमिकायां प्रकाशे च विपरीतं यतो वचः | उन्मत्तोsस्ति दयानन्दः वक्तुं तेन सुशक्यते ||
-----जय श्रीराम---- >>>>>>जयतु भारतम्, जयतु वैदिकी संस्कृतिः <<<<<<<<
>>>>>>आचार्य सियारामदास नैयायिक<<<<<<< — with आचार्य सियारामदास नैयायिक and 48 others.

दयानन्दीयभ्रान्तिगिरिभङ्ग, पृष्ठ-८,
स्वामी दयानन्द—ब्राह्मणग्रन्थ वेद के व्याख्यान हैं पर वेद नही— “ ब्राह्मणानि तु वेदाख्यानान्येव सन्ति, नैव वेदाख्यानानि “-ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, पृष्ठ-८६,
समाधान—
आचार्य सियारामदास नैयायिक—वाह स्वामी जी ! वेद के व्याख्यान है ब्राह्मणग्रन्थ, पर वेद नहीं | क्या तर्क है ?
महर्षि पाणिनि के सूत्रों पर व्याख्यानात्मक विपुलकाय महाभाष्य जैसा ग्रन्थ है ,क्या वह व्याख्यान होने के कारण व्याकरण नही माना जायेगा ? आप भी तो उस व्याख्यान रुपी महाभाष्य को व्याकरण मानते हैं , और न मानने वालों पर आप आश्चर्य भी व्यक्त करते हैं | 

देखें स्वामी जी का साक्ष्य—“ मैथिल पंडित ने कहा—महाभाष्य तो व्याकरण ही नही ”|स्वामी जी ने उठते हुए कहा कि—“ यह एक विलक्षण सभा है | जिसमें महाभाष्य व्याकरण नही माना जाता | और यह पंडित जी भी एक विचित्र बुद्धि के धनी हैं, जो व्याकरण की गणना महाभाष्य में नही करते “ | 
--श्रीमद्दयानंद प्रकाश, गंगाकाण्ड-सरह २ /पृष्ठ—७१, 
आप सूत्रों के व्याख्यान महाभाष्य को व्याकरण मान लिए फिर यहाँ मन्त्रों के व्याख्यान ब्राह्मणभाग को उसी आधार से वेद क्यों नही मान लेते ? जबकि प्रमाण और साक्ष्यों के आधार पर हम उसे वेद सिद्ध कर चुके हैं |
मन्त्र भाग और ब्राह्मण भाग का उपदेष्टा परमात्मा हम दोनों को मान्य है सर्वज्ञ इश्वर से प्रोक्त होने के कारण समप्रामाण्यं भी दोनों में है | तथा उनके प्रयोगों की सिद्धि के लिए व्याकरण के सूत्र भी सामान हैं , भेद मानने पर ब्राह्मण भाग के प्रयोग भी सिद्ध नही हो सकते |
इसीलिये हमारे सभी ऋषियों ने चाहे वे व्यास जी हों या महर्षि जैमिनि, चाहे महर्षि पाणिनि हों या भगवान् पतंजलि , चाहे वे महर्षि आपस्तम्ब हों या ऋषिवर कात्यायन--ये सब ब्राह्मणभाग तथा मन्त्रभाग दोनों को अनादिकाल से वेद मानते चले आ रहे हैं |  समग्र अनुष्ठान विधि भाग पर आश्रित है | उसके विना किसी कर्म का अनुष्ठान ही नही हो सकता , केवल मन्त्र लेकर चाटेंगे क्या ? वेदविभाजक द्वैपायन व्यास जी के साक्षात शिष्य, १२ अध्यायों की पूर्व मीमांसा के प्रणेता महर्षि जैमिनि ने भी समान रीति से मन्त्र और ब्राह्मणभाग को वेद माना है | और आपके सभी तर्कों पर ताला जड़ दिया गया है |अतः कोई आधार नही कि हम आपका मिथ्या कथन स्वीकार करें | 
मन्यते मन्त्रभागे हि वेदत्वं श्रीमता यथा | व्याख्यानब्राह्मणग्रन्थे न महाभाष्यवत् कथम् ? ||
---जय श्रीराम---- -----जयतु भारतम्,जयतु वैदिकी संस्कृतिः---- ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का खण्डन
—आचार्य सियारामदास नैयायिक — with आचार्य सियारामदास नैयायिक and 48 others

दयानन्दीयभ्रान्तिगिरिभङ्ग, पृष्ठ-९ 

स्वामी दयानन्द से प्रश्न--
ऋग्वेदादि के व्याख्यानरूप ब्राह्मणभाग को वेद आप नही मानते तो यह बतलायें कि इस ब्राह्मण ग्रन्थ का कर्ता कौन है ? 
यदि आपके कथन " ऋषिभिरुक्तत्वाद् " से इसके कर्ता ऋषि माने जांय। तो आपके " सत्यार्थ प्रकाश " के अनुसार समाधि में परमात्मा से ऋषियों ने जिन अर्थों को प्राप्त किया उन्हे " ब्राह्मणग्रन्थ " कहते हैं --इससे प्रत्यक्ष विरोध है ;
क्योंकि कोई वस्तु किसी से प्राप्त करने मात्र से हम उसके प्रणेता नही बन जाते । क्या व्याकरण के 14 सूत्रों को भगवान् महेश्वर से प्राप्त करने वाले महर्षि पाणिनि उनके रचयिता मान लिए गये ?
क्या अन्य देश से प्राप्त हुई तोपों या टेक्नालिजी का कर्ता कोई हमें मानता है? अरे दूसरों की बात छोड़िये हम स्वयं नही मानते । अतः परमात्मा से प्राप्त ब्राह्मण ग्रन्थ के कर्ता ऋषि कैसे माने जा सकते हैं ? और वेद के गम्भीर रहस्यों का ज्ञान ईश्वर को छोड़कर अन्य को हो भी कैसे सकता है ?
अतः जैसे मन्त्रभाग ईश्वर से प्राप्त होने के कारण ऋषि उसके केवल द्रष्टा कहे जाते हैं स्रष्टा नही । यही स्थिति ब्राह्मणभाग के विषय में है । अत एव ईश्वर से प्राप्त और ऋषियों से दृष्ट मन्त्रभाग जैसे वेद हैं , ठीक वैसे ही ईश्वर से प्राप्त और ऋषियों से दृष्ट " ब्राह्मणभाग " भी वेद हैं ।
---- जय श्रीराम ------जयतु भारतम्, जयतु वैदिकी संस्कृतिः-----  ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का खण्डन --आचार्य सियारामदास नैयायिक — with आचार्य सियारामदास नैयायिक and 48 others.

ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकाखण्डनम् , पृष्ठ-10,
ब्राह्मणभाग के अवेदत्वसाधक तर्क और उनका खण्डन-- 
तर्क-ब्राह्मणभाग वेद नही हैं ;क्योंकि वे व्याख्यानात्मक होने से मन्त्रभाग के पश्चात् बने हैं,घटादि के समान,
खण्डन-आप ऋग् यजुः साम और अथर्व इन 4 प्रकार के मन्त्रभागों में ऋग्वेद के बाद यजुर्वेद, यजुर्वेद के बाद सामवेद और सामवेद के बाद अथर्ववेद मानते हैं या नहीं ?
यदि इनमें आप क्रम मानते हैं तो आपके तर्कानुसार केवल ऋग्वेद ही वेद होगा ,यजुर्वेद आदि नही ;क्योंकि जैसे मन्त्रभाग के बाद ब्राह्मणभाग बना है अतः वह वेद आपको स्वीकृत नहीं है । ठीक इसी तरह ऋग्वेदरूपी मन्त्रभाग के बाद यजुः साम और अथर्ववेद भी बना है । अतः ये सभी आपके द्वारा वेद नही माने जाने चाहिए ।
तात्पर्य यह कि " पश्चात् निर्मितत्व " हेतु से ब्राह्मणभाग  के वेदत्व का निराकरण आपको यजुः साम और अथर्व इन तीनों वेदों से भी हाथ धुला देगा । अधिक क्या कहूं -- ऋग्वेद से भी हाथ धो बैठेंगे ; क्योंकि विपुलकाय ऋग्वेद में भी मन्त्रों का क्रम है --एक के बाद दूसरा,दूसरे के बाद तीसरा । फिर तो प्रथम मन्त्र से भिन्न शेष सभी मन्त्र ब्राह्मणभाग की भांति बाद में बने होने से वे भी वेद नही हैं --ऐसा आपको स्वीकार करना पड़ेगा । 
इतना ही नही, प्रथम मन्त्र में भी प्रथम वर्ण से भिन्न शेष वर्ण बाद में ही कण्ठताल्वादि अभिघात से जन्य होने के कारण उनमें भी " पश्चात् निर्मितत्व " ब्राह्मणभाग की भांति होने से उसी के समान वेद नहीं हैं --ऐसा आपको हठात् मानना पड़ेगा। अतः ऐसा तर्क मत दें कि एक वर्ण को छोड़कर शेष सम्पूर्ण संहिता भाग से ही हाथ धो बैठे ।
शंका-- बन्धुवर! मन्त्र से मेरा तात्पर्य मन्त्रत्व धर्म से युक्त सभी मन्त्रों अर्थात् चारों वेदों से है और यह मन्त्रत्व ऋग्वेद के प्रथम वर्ण से लेकर अथर्ववेद के चरम वर्ण तक व्याप्त है । अतः मन्त्र अर्थात् चारों वेदों से बाद मे बना होने के कारण ब्राह्मणभाग वेद नही है ।
समाधान--जी मित्रवर! आपके तात्पर्य को हृदयंगम करके ही आपत्ति दी गयी है । प्रथम वर्ण से चरम वर्ण तक व्याप्त मन्त्रत्व एक एक वर्ण और एक एक मन्त्र में व्याप्त होने से ही तो एक एक मन्त्र मन्त्र कहा जा सकता है । अब मन्त्र शब्द से केवल चारों वेद ही नही अपितु एक एक मन्त्र भी सहजतया पकड़े जा सकते हैं । तब प्रथम मन्त्र से भिन्न शेष सभी मन्त्र ब्राह्मणभाग की भांति ही वेद नही हैं--ऐसा आपको अगत्या स्वीकार करना पड़ेगा । और दूसरा कथित दोष तो है ही।
अतः आपकी स्थिति " चले थे नमाज छुड़ाने रोजे गले पड़ गये" जैसी हो जायेगी ।
---जय श्रीराम--- ----जयतु भारतम्,जयतु वैदिकी संस्कृतिः----  -----आचार्य सियारामदास नैयायिक----- — with आचार्य सियारामदास नैयायिक and 48 others.


स्वामी दयानन्द जी का छल-- ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकाखण्डनम्,पृष्ठ-11,
स्वामी दयानन्द --ब्राह्मणभाग वेद नही हैं ; क्योंकि उनकी पुराणेतिहास संज्ञा है- " पुराणेतिहास संज्ञकत्वादिति-- ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका पृष्ठ-84-85,
आचार्य सियारामदास नैयायिक--वाह स्वामी जी ! आपने जो " पुराणेतिहाससंज्ञकत्व " हेतु दिया है । यह मात्र धूलि- प्रक्षेप है ; क्योंकि न्यायदर्शन के भाष्यकार ने स्वयं ब्राह्मणभाग को इतिहासपुराण से भिन्न माना है । देखें -- " अन्यो मन्त्रब्राह्मणस्य विषयः, अन्यश्चेतिहासपुराणधर्मशास्त्राणाम्-4/1/61, यहां भाष्यकार ने मन्त्र और ब्राह्मण से भिन्न विषय वाला पुराण इतिहास को कहा है ।
वे मन्त्र ब्राह्मण का विषय यज्ञ और इतिहास पुराण का विषय लोकवृत्त को बतलाते हैं --
" यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य, लोकवृत्तमितिहासपुराणस्य, तत्र एकेन न सर्वं व्यवस्थाप्यते -इति यथाविषयमेतानि प्रमाणानि इन्द्रियादिवत् "।--४/१/६१,    अतः विषयभेद से ब्राह्मण और इतिहास पुराण में भेद है ।
जैसे रूप का बोध कराने वाली चक्षुरिन्द्रय से गन्ध की ग्राहिका श्रोत्रेन्द्रिय भिन्न है । वैसे ही यज्ञविषयक बोध के कारण ब्राह्मणभाग से लोकवृत्त के बोधक इतिहास पुराण भिन्न हैं ।
इसलिए ब्राह्मण ग्रन्थ में " पुराणेतिहास संज्ञकत्व " हेतु ही नही है । अत एव " पक्षे हेत्वभावः स्वरूपासिद्धिः" के अनुसार आपका हेतु स्वरूपासिद्ध है । जो दुष्टहेतु होने के कारण ब्राह्मणभाग में अवेदत्व नही सिद्ध कर सकता ।
आज के नेताओं की भांति आप जैसे ऋषि भी दुष्टों के बल पर अपने पक्ष की पुष्टि करने लगे । जिसे ध्वस्त कर दिया गया ।
द्वितीय आपत्ति-- स्वामी जी ! आप सर्वथा ऋषिविरोधी हैं ;क्योंकि न्यायदर्शनभाष्यकार महर्षि वात्स्यायन ने पुराण के पूर्व इतिहास शब्द का प्रयोग किया है ।
भगवान् बादरायण भी " इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् " में पुराण की अपेक्षा इतिहास का वैशिष्ट्य बतलाने के लिए समास स्थल में उसका पूर्व प्रयोग किये । पर आप इन सबके विरोधी निकले ।
अभ्यर्हित का भी ध्यान नही रखे । " युधिष्ठिरार्जुनौ "के स्थान पर " अर्जुनयुधिष्ठिरौ " का प्रयोग कीजिए ;क्योंकि " अल्पाऽच्तरम् " सूत्र बड़ा सस्ता है । " भ्रातुर्ज्यायसः" और " अभ्यर्हितं च " जैसे वार्तिक से पिण्ड छूटेगा ।
------जय श्रीराम-----------जयतु भारतम्,जयतु वैदिकी संस्कृतिः------ 
-----आचार्य सियारामदास नैयायिक----- — with आचार्य सियारामदास नैयायिक and 23 others.

ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकाखण्डनम्, पृष्ठ-12,
न्यायदर्शन सूत्रकार महर्षि गौतम और भाष्यकार से विरुद्ध दयानन्द का असत्प्रलाप 

स्वामी दयानन्द जी ने पुराणेतिहाससंज्ञकत्व को हेतु बनाकर ब्राह्मणभाग के वेदत्व का खण्डन करते हुए ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका पृष्ठ 84-85 में न्यायसूत्र और वात्स्यायनभाष्य को अपने समर्थन में प्रमाण रूप से प्रस्तुत किया है । 
आचार्य सियारामदास नैयायिक-- स्वामिप्रवर! पुराणेतिहाससंज्ञकत्व हेतु ब्राह्मणभाग में न होने से स्वरूपासिद्धि दोष आपके अनुमान में प्रदर्शित किया जा चुका है । रही बात न्यायसूत्र और उसके भाष्य की,तो समझ लीजिए कि यहां भी आपका कथन सर्वथा निर्मूल है;क्योंकि सूत्रकार महर्षि गौतम और भाष्यकार महर्षि वात्स्यायन ये दोनो ही ब्राह्मणभाग को वेद मानते हैं । 
महर्षि गौतम 2/1/49,सूत्र से शब्दप्रामाण्य पर विचार आरम्भ करते हुए  सूत्र56 तक शब्दसामान्य पर विचार किये । पुनः "तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्तदोषेभ्यः-न्यायसूत्र-2/1/57,से वेदप्रामाण्य पर विचार आरम्भ करते हैं । इस सूत्र के भाष्य में महर्षि वात्स्यायन लिखते हैं कि- यहां तद् शब्द से वेदरूप शब्दविशेष को अधिकृत करके भगवान् ऋषि बोल रहे हैं --
"तस्येति शब्दविशेषमेवाधिकुरुते भगवान् ऋषिः "।
न्यायवार्तिककार इसे और स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि प्रकरण चूंकि शब्दप्रमाण का चल रहा है अतः प्रकरण से शब्द तो प्राप्त ही है इसलिए प्रकरण से प्राप्त शब्द का पुनःतद् शब्द से सूत्रकार को ग्रहण करने की कोई आवश्यकता नहीं थी । फिर भी उन्होने ग्रहण किया । इससे वे बताना चाहते हैं कि अब जो विचार चल रहा है वह शब्दविशेष के प्रति है --
" तदित्यधिकृतशब्दाभिधानाच्छब्दविशेषाधिकारः--- यस्मात् प्राप्तमपि प्रकरणेन शब्दं तच्छब्देन पुनरभिधत्ते तत्र ज्ञापयति शब्दविशेषं प्रतीयं चिन्ता न तु शब्दमात्रं प्रति "।  इस अधिकृतशब्द को न्यायवार्तिकतात्पर्यटीकाकार वाचस्पति मिश्र और सुस्पष्ट कर दिये " अधिकृतः शब्दो वेदः "। 
अर्थात् 2/1/57 सूत्र से वेदप्रामाण्य का विचार हो रहा है । यहां सूत्रकार ने अनृत,व्याघात और पुनरुक्त इन 3 दोषों को वेद में दिखाया -- 
" पुत्रकामः पुत्रेष्ट्या यजेत " । पुत्रेष्टि होने पर भी कभी कभी पुत्रजन्म नही दिखता । अतः जब दृष्टार्थ वेदवाक्य झूंठा है तो स्वर्गादि अदृष्टार्थ विधायक " अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः " वाक्य भी झूंठा है ।
( यहां दयानन्द जी का छल देखने लायक है । इन्होने अपने कथन मे प्रमाणत्वेन न्यायदर्शन के भाष्य को प्रस्तुत किया ,पर स्वयं भाष्यकार के विरुद्ध चल रहे हैं ;क्योंकि भाष्यकार सूत्रकार के अनुसार दृष्ट अदृष्टफलक वेदवाक्यों को उद्धृत किये ,किन्तु केवल मन्त्रभाग को वेद मानने वाले दयानन्द के पास इन सबका विधान करने वाला कोई वाक्य है ही नही ।अग्निहोत्रका फल ये वातावरण की शुद्धि मानते हैं । ) 
जिस अग्निहोत्र का विधान करते हैं --
" उदिते होतव्यम् ,अनुदिते होतव्यम्,समयानध्युषिते होतव्यम् " । उन वाक्यों से विहित होम की निन्दा भी वेद कर रहे हैं -जो उदितकाल में हवन करता है उसके हवन को श्याव खा जाते हैं जो अनुदितकाल में करता है उसके हवन को शबल खा जाते हैं और समयाध्युषित में किये गये हवन को श्याव शबल दोनो खा जाते हैं --
"श्यावोऽस्याहुतिमभ्यवहरति य उदिते जुहोति,शबलो--योऽनुदिते जुहोति ,श्यावाशबलौ वाऽस्याऽऽहुतिमभ्यवहरतो यः समयानध्युषिते जुहोति "। 
ये वाक्य पूर्व के विधिवाक्य से विरुद्धार्थक हैं अतः प्रमाण नही । और पनरुक्ति दोष भी वेद में है --
" त्रिः प्रथमामन्वाह त्रिरुत्तमाम् "। इस प्रकार भाष्यकार ने सूत्रकार के आशय को ब्राह्मण भाग के वाक्यों को प्रस्तुत करके प्रकट किया । और स्वयं सूत्रकार ने इन सभी अनृत,व्याघात और पनरुक्ति दोषों का वारण किया है--
" कर्मकर्तृसाधनवैगुण्यात् "-2/1/58, पुत्रकामेष्टि विधिवाक्य में अनृतदोप नही है ;क्योंकि कर्म--पुत्रेष्टि के अंगभूत कर्मों में न्यूनता रूपी वैगुण्य, कर्तृवैगुण्य--इष्टि करने वालों की तद्विषयक अज्ञानता रूपी वैगुण्य( कमी )। साधनवैगुण्य--असंस्कृत हवि का ग्रहण,मन्त्रों में न्यूनाधिक्य, स्वरहीनता वर्णहीनता , घूसखोरी ,घोटाला आदि से प्राप्त द्रव्य की दक्षिणा --इन सबकी गड़बड़ी से पुत्रेष्टि में कमी आ जाने से वह पुत्ररूपी फल नही दे पाती । 
अतः उसके विधि वाक्य को झूंठा नहीं कह सकते । और जो हवन को लेकर व्याघात दोष दिखाया गया वह भी ठीक नही । इसको सूत्रकार प्रस्तुत करते हैं --" अभ्युपेत्य कालभेदे दोषवचनात् "-2/1/59,
अभ्युपेत्य--अग्न्याधानकाल में सूर्य के उदित या अनुदित अथवा इससे भिन्न जो भी काल -समय स्वीकार किया गया है हवन के लिए, उसे स्वीकार करके ,कालभेदे --हवन के उस काल का अतिक्रमण होने पर समय बीत जाने के कारण हवनकाल में भेद हो गया और ऐसा होने पर ही ,दोषवचनात् --जो उदितकाल में हवन करता है उसके हवन को कुत्ते खा जाते हैं --श्यावोऽस्याहुतिमभ्यवहरति --" इत्यादि वाक्य हैं |
अर्थात अग्न्याधानकाल में स्वीकृत हवनकाल से भिन्न काल में की गयी हवन की यहां निन्दा की गयी है । जो जिस समय हवन शुरु किया उसी समय जीवन भर करे । तभी उसे पूर्ण लाभ मिलेगा । इसी में उन वाक्यों का तात्पर्य है , अतः व्याघात दोष भी नही । इसलिए वे वाक्य प्रमाण हैं ।
पुनः जो पौनरुक्त्य दोष दिया गया था-- " त्रिः प्रथमामन्वाह त्रिरुत्तमाम् "-तै. सं. 2/5, इसका समाधान भगवान् सूत्रकार कर रहे हैं--
" अनुवादोपपत्तेश्च "-2/1/60, 
सामिधेनी का 3-3बार पूर्वोक्तविधि से गान होने से उनकी 15 संख्या पूर्ण हो जाती है । जिसका उल्लेख " इदमहं भ्रातृव्यं पञ्चदशावरेण वाग्वज्रेणावबाधे " इस अर्थवाद में15संख्या के कथन से सार्थक सिद्ध होता है । 
" पुनः पुनः सार्थक कथन अनुवाद कहा जाता है -- अर्थवान् अभ्यासोऽनुवादः --भाष्य ।
पुनः पुनः अनर्थक कथन ही पुनरुक्ति है-- "अनर्थकोऽभ्यासः पुनरुक्तम् । जो " त्रिः प्रथमामन्वाह त्रिरुत्तमाम् " में नही है ;क्योंकि उसमें अनुवाद की उपपत्ति की जा चुकी है ।
तात्पर्य यह कि न्यायदर्शन सूत्रकार ने जो पूर्व में अनृत आदि 3 दोषों को दिखाकर उसका समाधान 3सूत्रों से किया उन्ही दोषों को ब्राह्मणभाग के उक्त वाक्यों को उद्धृत करके भाष्यकार ने सुस्पष्ट दिखलाकर उन सूत्रों के अनुसार ही उनका खण्डन करते हुए भाष्य लिखा । 
यदि ब्राह्मणभाग इन दोनो को वेद मान्य नही होते तो वेदप्रामाण्यविचार की प्रतिज्ञा करके ब्राह्मणभाग के प्रामाण्य पर शंका उठाकर उसका समाधान क्यों देते ? 
अतः सूत्रकार और भाष्यकार इन दोनों को ब्राह्मणभाग वेदत्वेन मान्य हैं । अत एव इन दोनों से अमान्य इनका आशय बताकर स्वामी दयानन्द ने समाज के साथ छल किया है ।
ब्राह्मणभाग के अवेदत्वसाधन में स्वामी दयानन्द जी ने जो " पुराणेतिहाससंज्ञकत्व हेतु दिया है । वह भी भाष्यकार से विरुद्ध है; क्योंकि भाष्यकार ब्राह्मणभाग से इतिहास पुराण को भिन्न मानते हैं । 
वे कहते हैं कि ब्राह्मण का विषय भिन्न है और इतिहास पुराण का विषय भिन्न--
" अन्यो मन्त्रब्राह्ममस्य विषयः ,अन्यश्चेतिहासपुराणधर्मशास्त्रणाम् । 
मन्त्रब्राह्मण का विषय-यज्ञ है और इतिहास पुराण का विषय -लोकवृत्त-
" यज्ञो मन्ब्राह्मणस्य, लोकवृत्तमितिहासपुराणस्य । 
भाष्यकार ने तो स्पष्ट कह दिया है कि प्रमाणभूत ब्राह्मण से इतिहासपुराण का प्रामाण्य प्रमाणित होता है --
" प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेनेतिहासपुराणस्य प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते " ।
इससे इस भाष्य का अनुवाद जानने वाला भी समझ सकता है कि इतिहास पुराण और ब्राह्मणभाग परस्पर भिन्न हैं । फिर भी इस पर महामनीषी स्वामी दयानन्द जी की दृष्टि नही गयी।या इन्होने जानकर छल किया । कण्ठतः ब्राह्मणभाग के वाक्य का वैदिक वाक्यत्वेन कथन भगवान् न्यायदर्शनभाष्यकार महर्षि वात्स्यायन--
" ऋणक्लेशप्रवृत्त्यनुबन्धादपवर्गाभावः " 4/1/58,सूत्र के भाष्य में उद्धृत " जायमानो ह वै ब्राह्मणस्त्रिभिर्ऋणैर्ऋणवान् जायते ,--  इत्यादि ब्राह्मणभाग के वाक्य को  
" प्रधानशब्दानुपपत्तेर्गुणशब्देनानुवादो निन्दाप्रशंसोपपत्तेः" -4/1/59,
सूत्र के भाष्य में स्पष्टतया वैदिक वाक्य कहते हैं --
" न भिद्यते च लौकिकाद् वाक्याद् वैदिकं वाक्यं प्रेक्षापूर्वकारिपुरुषप्रणीतत्वेन " ।
और ब्राह्मणभाग के विधिवाक्य, अर्थवादतथा अनुवादात्मक वाक्यों पर विशेष विचार सूत्रों के माध्यम से करने वाले महर्षि गौतम के सूत्र  " विधिविहितस्यानुवचनमनुवादः"-2/1/65, पर भाष्य में महर्षि वात्स्यायन 
ने डिमडिम घोषपूर्वक कहा है कि जैसे --    लौकिक वाक्य में विधि,अर्थवाद और अनुवाद इस प्रकार 3 विभाग है और उनका प्रयोजन होने से जैसे वे प्रमाण हैं । ठीक वैसे ही वेदवाक्य भी विधि अर्थवाद तथा अनुवाद भेद से 3 प्रकार होने से सप्रयोजन होने के कारण प्रमाण हैं ---
" यथा लौकिके वाक्ये विभागेनार्थग्रहणात् प्रमाणत्वम् एवं वेदवाक्यानामपि विभागेनार्थग्रहणात् प्रमाणत्वं भवितुमर्हतीति ।। --2/1/65, 
इतना स्पष्ट होनेपर भी स्वामी जी " न्याय-सूत्रकार और भाष्यकार ब्राह्मणभाग को वेद नही मानते " --ऐसा कह रहे हैं तो मैं इनके लिए यही कहूंगा कि " नह्येष स्थाणोरपराधः यदेनम् अन्धो न पश्यति "|
अतः न्यायदर्शनसूत्रकार महर्षि गौतम तथा न्यायसूत्र के भाष्यकार महर्षि वात्स्यायन ये दोनों ब्राह्मणभाग को वेद मानते हैं । स्वामी दयानन्द जी के समर्थन में आज तक न तो कोई ऋषि है और न ही कोई दार्शनिक ।
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स्वामी दयानन्द का छल   
ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकाखण्डनम्, पृष्ठ-13
भाष्यभूमिका के पृष्ठ-84 पर स्वामी दयानन्द ने ब्राह्मणभाग का अवेदत्व सिद्ध करने के लिए महर्षि वात्स्यायन के भाष्य को एक छली व्यक्ति की भांति प्रस्तुत किया है । देखें -- 
" प्रमाणं शब्दो यथा लोके विभागश्च ब्राह्मणवाक्यानां त्रिविधः "  
इतना उद्धृत करके स्वामी जी इसका अभिप्राय आगे लिखते हैं -- 
" अयमभिप्रायःब्राह्मणग्रन्थशब्दा लौकिका एव न वैदिकाः" ।
यहां दयानन्द जी " शब्द -वेद, प्रमाण है ,यथा-जैसे,लोके- लोक अर्थात् वेदभिन्न स्थल में ब्राह्मणवाक्यों के 3 प्रकार के विभाग " ।
यहां स्वामी जी वात्स्यायनभाष्य के पूर्वोक्त वाक्य से अपना अभीष्ट छलपूर्वक सिद्ध करना चाहे हैं । चाहे इसलिए कहना पड़ रहा है ; क्योंकि  पूर्व पोस्ट में न्यायसूत्रकार और भाष्यकार के क्रमशः सूत्र एवं भाष्यवाक्यों
को प्रस्तुत करके यह सिद्ध कर दिया गया है कि सूत्रकार और भाष्यकार दोनो ही ब्राह्मणभाग को वेद माने हैं । 
अब जरा आर्यसमाज के संस्थापक की प्रत्यक्ष धूर्तता देखिये -- 
स्वामी दयानन्द का प्रत्यक्ष छल--
महाशय ने जो न्यायभाष्य को प्रस्तुत किया है । वह एक वाक्य नही है ।
" प्रमाणं शब्दो यथा लोके " इतना वाक्य " वाक्यविभागस्य चार्थग्रहणात् "-2/1/61सूत्र का भाष्य है ।
जिसका अर्थ है--प्रमाणं --प्रमाण है,शब्दो--वेद, अर्थात् वेद प्रमाण हैं । कैसे ? 
इसका उत्तर दृष्टान्त की शैली में दे रहे हैं भाष्यकार-- " यथा लोके--जैसे लोक में। क्या लोक में ? पञ्चम्यन्त शब्दघटित सूत्र से समझिये । 
अर्थात् लोक में जैसे विधि,अर्थवाद और अनुवाद इस प्रकार तीन विभाग वाले वाक्य प्रयोजन वाला होने से प्रमाण होते हैं इसी तरह तीन विभाग वाले वेद के वाक्य भी प्रमाण हैं ।
इतना ही "प्रमाणं शब्दो यथा लोके " का तात्पर्य है जो " वाक्यविभागस्य चार्थग्रहणात् "-2/1/61 सूत्र पर महर्षि वात्स्यायन ने लिखा है । अब इस सूत्र के बाद सूत्र आता है--" विध्यर्थवादानुवादवचनविनियोगात् " --2/1/62, 
इस सूत्रारम्भ को भाष्यकार दिखाने के लिए भाष्य लिखते हैं--
" विभागश्च ब्राह्मणवाक्यानां त्रिविधः " ।
ब्राह्मणवाक्यों का तीन प्रकार का विभाग है।
सुधीजन यहां देख सकते हैं कि भाष्य के दोनो वाक्य पृथक् पृथक् सूत्रों के हैं । और इनका तात्पर्य भी एकदम सुस्पष्ट है । प्रथम वाक्य से 2/1/61सूत्र के भाष्य में वेद को प्रमाण कहा गया जैसे-
लोक में त्रिविध भेद वाला वाक्य सप्रयोजनक होने से प्रमाण है ।
अब जो 2/1/61 सूत्र में वाक्यों का विभाग कहा गया उसे ही स्पष्ट करने के लिए सूत्रकार " विध्यर्थवादानुवादवचनविनियोगात् "-2/1/62 सूत्र का प्रणयन किये । जिसका भाष्य है --" विभागश्च ब्राह्मणवाक्यानां त्रिविधः " ।
इस वाक्य से सूत्रोक्त विधि,अर्थवाद और अनुवाद इन तीन प्रकार के ब्राह्मणवाक्यों का सुस्पष्ट कथन किया जा रहा है । पर स्वामी दयानन्द जी ने भिन्न भिन्न सूत्रों के भाष्यवाक्यों को एक में मिलाकर धूलिप्रक्षेप के सहारे ब्राह्मणभाग को अवेद सिद्ध करने का कुत्सित प्रयास किया । जिसकी पोलपट्टी खोलकर धज्जी धज्जी उड़ा दी गयी ।    स्वामी दयानन्द की इस छलभित्ति पर ही एक समाज खड़ा हो गया । 
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ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकाखण्डनम् पृष्ठ १४, 
स्वामी दयानंद ब्राह्मणभाग का अवेदत्व सिद्ध करने के लिए न्यायसूत्र  और उसके भाष्य को प्रमाणत्वेन प्रस्तुत किये जिसकी धज्जी धज्जी उड़ा दी गयी | अब हम यह दिखा रहे हैं कि न्यायसूत्र और उसके भाष्य इन दोनों से ब्राह्मणभाग वेदत्वेन स्वीकृत हैं | महर्षि गौतम ने वेद के प्रामाण्य को दृढ़ करने के लिए स्थूणानिखानान्याय से उसके अप्रामाण्य की शंका-
“ तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्तदोषेभ्यः ”-२/१/५७, सूत्र से उठाई |
इसके भाष्य में “ पुत्रकामः पुत्रेष्ट्या यजेत ” , “अग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकामः ” ,“ उदिते होतव्यम् अनुदिते होतव्यम् , समयाध्युषिते होतव्यम् ” , “ त्रिः प्रथमामन्वाह त्रिरुत्तमाम् ” आदि ब्राह्मणभाग के ही वाक्य प्रस्तुत किये गए | और इन ब्राह्मणवाक्यों के प्रामाण्य की उपपत्ति स्वयं भगवान् सूत्रकार “ न कर्मकर्तृसाधनवैगुण्यात् ”- २/१/५८, “ अभ्युपेत्य कालभेदे दोषवचनात् ”-२/१/५९, “ अनुवादोपपत्तेश्च ”-२/१/६०,-इन सूत्रों से की | 
यदि ब्राह्मणभाग उनकी दृष्टि में वेद नही होते तो वे (सूत्रकार) वेद के अप्रामाण्य की शंका उठाकर ब्राह्मणभाग के वाक्यों के अनुसार सूत्र का प्रणयन और प्रामाण्य क्यों व्यवस्थित करते? और उसके भाष्यकार ब्राह्मण भाग के वाक्यों को सूत्र के अनुसार क्यों उद्धृत करते ? 
ऐसा तो नही होता कि शंका तो आम के विषय में उठाई जाय और समाधान इमली के विषय में दिया जाय | 
अतः उपक्रम में शंका चूँकि वेद के अप्रामाण्य के विषय में की गयी और समाधान उपसंहार तक ब्राह्मणभाग के वाक्यों को लेकर किया गया |
इसलिए “ उपक्रमोपसंहार योरेकवाक्यत्वम् ” न्याय के अनुसार ब्राह्मणभाग वेदरूपेण न्यायदर्शनकार और भाष्यकार दोनों को मान्य हैं—
इस बात को वह भी समझ सकता है जिसका वेदान्त में मात्र चन्चुप्रवेश ही है |
किन्तु छली दयानन्द तो समाज की आँख में धूल झोंककर एक दुराग्रही समाज खडा करना चाहते थे इसलिए इन तथ्यों के विपरीत विषवमन किये |
हमारे न्यायदर्शनकार वेदप्रामाण्य को दृढ़ करने के बाद “ विध्यर्थवादानुवादवचनविनियोगात् ” -२/१/६२, सूत्र से ब्राह्मणभाग के विधि, अर्थवाद, और अनुवाद –इन तीन प्रकार के विभागों को प्रस्तुत कर लक्षणपूर्वक एक एक को सूत्र से दिखलाते हैं—
“ विधिर्विधायकः ”-२/१/६३, भाष्यं-यद्वाक्यं विधायकं चोदकं स विधिः | यथा – “ अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः ”| अर्थवाद—“ स्तुतिर्निन्दा परकृतिः पुराकल्प इत्यर्थवादः ”-२/१/६४, स्तुति वाक्य वे हैं जो विधिनिर्दिष्ट कार्य की प्रशंसा करके पुरुष को प्रवृत्त कराते हैं | जैसे-“ सर्वजिता वै देवाः सर्वमयजन –सर्वं जयति ” | 
निंदा-अनिष्ट फल बतलाने वाले वाक्य निंदा माने जाते हैं | ये प्राणी को निषिद्ध कर्म से रोकने के लिए होते हैं | इसी तरह परकृति और पुराकल्प भी अर्थवाद बतलाया गया है | 
इसमें पुराकल्प उसे कहते हैं जिसमे इतिहास के द्वारा विधि बतलाई जाती है |यद्यपि विधि को अर्थवाद कहना उचित नही है, तथापि इसका सम्बन्ध स्तुति निन्दावाक्य से होनेके कारण ही अर्थवाद की कोटि में रखा गया है 
“ विधिविहितस्यानुवचनमनुवादः ”-२/१/६५,यहाँ अनुवाद का द्वैविध्य बतलाकर कहा गया है कि अनुवाद शब्दानुवाद और अर्थानुवाद के भेद से दो प्रकार का होता है | 
विधि वाक्य से विहित को अधिकृत करके जो स्तुति या निंदा बोधित होती है | वे सब इसके अंतर्गत आते हैं | पूर्वसूत्रके विषय से इसमें भिन्नता है |  यहाँ पर न्यायभाष्यकार ने कहा है कि जैसे लोक में विधि अर्थवाद और
अनुवाद इस प्रकार के त्रिविध वाक्य होते हैं—
ओदनं पचेत्-यह विधिवाक्य है | यहाँ अर्थवाद वाक्य है- आयुर्वर्चो बलं सुखं प्रतिभानं चान्ने प्रतिष्ठितम् | इसका अनुवाद है- पचतु पचतु भवानित्यभ्यासः, क्षिप्रं पच्यतामिति वा |
इसी प्रकार वेद में भी होते हैं | इसी तथ्य को उक्त वाक्यों को लिखकर भाष्यकार लिखते हैं-
“यथा लौकिके वाक्ये विभागेनार्थाग्रहणात् प्रमाणत्वम् एवं वेदवाक्यानामपि विभागेनार्थग्रहणात् प्रमाणं भवितुमर्हति ” || 
जैसे लौकिक वाक्यों में विधि आदि त्रिविध विभाग से उनका प्रयोजन निश्चित होने से वे प्रमाण हैं ,ठीक इसी प्रकार वैदिक वाक्यों में भी विधि अर्थवाद और अनुवाद इस प्रकार त्रिविध विभाग होने से सप्रयोजन होने के कारण वे प्रमाण हैं | 
सुधी जन देख सकते हैं कि यहाँ लौकिक वाक्यों को दृष्टांत रूप में विधि अर्थवाद और अनुवाद के रूप में प्रस्तुत करके उनका प्रामाण्य दिखाकर उसी प्रकार “ वैदिक वाक्यानामपि “ से वैदिक वाक्यों को विधि आदि त्रिविध 
रूप में प्रस्तुत कर उसका प्रामाण्य भाष्यकार बतलाये | ये तीन विभाग ब्राह्मणभाग में ही हैं, -यह पहले ही सूत्रकार बतला चुके हैं |  
अतः सूत्रकार और भाष्यकार दोनों ही ब्राहमणभाग को वेद मानते हैं |
उनके विरुद्ध दयानन्द को मुख छिपाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नही बचा है | 
------जय श्रीराम----- -------जयतु भारतम् ,जयतु वैदिक संस्कृतिः------ 
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